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क्या भाजपा विधायक अब जमीन पर उतरेंगे? नगरपालिका नतीजों ने दिखाई हकीकत, फिर केंद्र में ‘अशोकराव फैक्टर’


SHAIKH JAHUR   published:  ২৬ ডিসেম্বর, ২০২৫, ০৮:০৯ এএম

क्या भाजपा विधायक अब जमीन पर उतरेंगे? नगरपालिका नतीजों ने दिखाई हकीकत, फिर केंद्र में ‘अशोकराव फैक्टर’

नांदेड: नगरपालिका चुनावों के नतीजों ने जिले की आगामी राजनीति की दिशा साफ कर दी है। इन परिणामों से यह एक बार फिर साबित हुआ है कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोकराव चव्हाण का नेतृत्व आज भी जिले की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। सत्ताधारी महायुति में शामिल भाजपा, शिंदे शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस (अजित पवार गुट) के कई विधायकों को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा विधायक अब इन नतीजों से सबक लेंगे और जमीनी हकीकत को स्वीकार करेंगे?

भोकर विधानसभा क्षेत्र में सांसद अशोकराव चव्हाण की पुत्री विधायक श्रीजया चव्हाण के क्षेत्र की दोनों नगरपालिकाओं में भाजपा को बहुमत जरूर मिला, लेकिन जिले के अन्य सत्ताधारी विधायकों के समीकरण पूरी तरह बिगड़ते नजर आए। कई स्थानों पर स्थानीय आघाड़ियां, कांग्रेस या अन्य दलों ने बाजी मारी। इससे आने वाले जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों में मौजूदा विधायकों के सामने अपना वर्चस्व फिर से साबित करने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

नगरपालिका चुनावों में यह भी सामने आया कि भाजपा विधायकों ने सांसद अशोकराव चव्हाण के साथ समन्वय किए बिना अपने स्तर पर रणनीति बनाई, जो कई जगहों पर असफल साबित हुई। गौरतलब है कि वर्ष 2009 में मुख्यमंत्री रहते हुए अशोकराव चव्हाण ने जिले की सभी नौ विधानसभा सीटों पर कांग्रेस गठबंधन का परचम लहराया था।

हालांकि 2024 के विधानसभा चुनावों में महायुति का स्ट्राइक रेट शत-प्रतिशत रहा, लेकिन नगरपालिका चुनावों में घटक दलों के बीच समन्वय की कमी साफ दिखाई दी। कार्यकर्ताओं के चुनाव में नेताओं के बीच मतभेद और स्वतंत्र लड़ाइयों के कारण कई निष्ठावान उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा।

इसी पृष्ठभूमि में भाजपा ने नांदेड महानगरपालिका चुनाव की प्रमुख जिम्मेदारी फिर से अशोकराव चव्हाण को सौंपी है। सांसद डॉ. अजित गोपछड़े को सह-प्रभारी नियुक्त कर पुराने-नए विवादों और इच्छुकों की नाराजगी पर काबू पाने का प्रयास किया गया है। यह फैसला इस बात का संकेत है कि भाजपा को अशोकराव चव्हाण के अनुभव और सर्वसमावेशी नेतृत्व की आवश्यकता है।

पालिका नतीजों पर नजर डालें तो बिलोली और धर्माबाद में मतदाताओं ने स्थानीय नेतृत्व और जिले के प्रभावशाली नेतृत्व को समर्थन दिया। उमरी में राष्ट्रवादी कांग्रेस (अजित पवार गुट) के गोरठेकर बंधुओं ने 20 में से 18 सीटें जीतकर न सिर्फ नगराध्यक्ष पद हासिल किया, बल्कि सीधे जिला परिषद चुनावों का बिगुल भी फूंक दिया। उन्होंने भाजपा विधायक राजेश पवार सहित भाजपा नेताओं को खुली चुनौती दी है।

किनवट, कंधार और हिमायतनगर में भी सत्ताधारी विधायकों की छाप कमजोर रही। हिमायतनगर में मिली सफलता से कांग्रेस को नई ऊर्जा मिली है, जिससे आगामी चुनावों में पूर्व विधायक माधवराव जवळगांवकर विरोधियों को फिर ‘हाथ’ दिखा सकते हैं।

समय रहते नेतृत्व स्वीकार करना जरूरी
आगामी जिला परिषद और महानगरपालिका चुनावों की पृष्ठभूमि में सत्ताधारी विधायकों को इन नतीजों पर आत्ममंथन करना होगा। विशेष रूप से भाजपा विधायकों को यदि अशोकराव चव्हाण के साथ समन्वय बनाकर संगठनात्मक मजबूती पर काम करना है, तभी जिला परिषद और महानगरपालिका पर भाजपा का झंडा फहराना संभव होगा। अन्यथा नगरपालिका चुनावों से मिला यह संकेत अगर नजरअंदाज किया गया, तो बड़े चुनावों में इसकी पुनरावृत्ति से इनकार नहीं किया जा सकता।

पालिका की जीत से राष्ट्रवादी को भी बढ़त
विधायक प्रतापराव चिखलीकर के गढ़ लोहा नगरपालिका में राष्ट्रवादी कांग्रेस (अजित पवार गुट) ने भाजपा को करारी शिकस्त देकर अपना नेतृत्व साबित किया। हालांकि कंधार में नगराध्यक्ष पद पार्टी को बरकरार नहीं रख पाया। जिले की 13 नगरपालिकाओं में से तीन में राष्ट्रवादी के नगराध्यक्ष और कुल 71 नगरसेवकों की जीत ने पार्टी को मजबूती दी है। इसके उलट शिंदे शिवसेना को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। वहीं मुखेड में शिंदे गुट की विजया देबडवार की जीत से विधायक डॉ. तुषार राठोड के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है।